सुनने की कला — आध्यात्म का सबसे बड़ा रहस्य
जो सच में सुनना सीख जाता है, वह भीतर के परमात्मा को सुन लेता है।
खंड 1
सुनना — यह शब्द जितना साधारण लगता है, अध्यात्म में उतना ही गहरा है। हम सब सुनते हैं, पर क्या हम सच में सुनते हैं? या सिर्फ़ शब्दों को गुज़र जाने देते हैं?
सुनना और श्रवण में फर्क
सुनना कानों का काम है, पर श्रवण आत्मा का। जब तुम बिना judge किए, बिना अगली बात सोचे, पूरी तरह उपस्थित होकर सुनते हो — तब श्रवण होता है। यही ध्यान की पहली सीढ़ी है।
भीतर की आवाज़ कैसे सुनें
बाहर का शोर जितना कम होगा, भीतर की आवाज़ उतनी साफ़ सुनाई देगी। शुरुआत ऐसे करो:
नाद: ब्रह्मांड की ध्वनि
हमारे ऋषियों ने कहा — पूरा ब्रह्मांड एक ध्वनि से बना है, जिसे नाद कहते हैं। ॐ उसी नाद का प्रतीक है। जब मन शांत होकर इस भीतरी नाद को सुनने लगता है, तब साधक और ब्रह्मांड एक हो जाते हैं।
रोज़ का छोटा अभ्यास
सुनने की कला किताबों से नहीं, अभ्यास से आती है। आज से यह करके देखो:
Leave a Reply